पूज्या मां श्री के चरणों में बारंबार वंदन ...
सभी को सादर जय जिनेंद्र
मां श्री जी कर्म सिद्धांत के ऊपर पिछली कुछ मीटिंग से समझा रहे हैं, उसी में ही आगे समझाते हुए मां श्री जी ने बताया की,क्रियाएं दो प्रकार की होती हैं, एक क्रिया जिसमें एक स्थान से दूसरे स्थान की तरफ स्थानांतरण होता है और दूसरी क्रिया जिसे परिस्बंधन कहते हैं, उसमें एक अवस्था से दूसरे अवस्था में परिवर्तन होता है जैसे कि आम पेड़ से नीचे गिर जाए तो वह क्रिया है, और आम हरे से पीला हो जाए तो वह परिस्पंदन है|
आगे समझाते हुए, माँ ने बताया कि, दो प्रकार के द्रव्य होते हैं, जीव, अजीव, जिसको हम आत्मा और पुद्गल भी कहते हैं| दो विशेष गुणों के कारण, यह दोनों द्रव्य आपस में परस्पर मिलते रहते हैं, वह दो विशेष गुण है -
१. स्निग्धा, यानि - चिकनापन
२. रुख्श, यानि - रुखापन
चिकना - चिकने से नहीं मिलेगा और रुखा- रुखे से नहीं मिलेगा, लेकिन चिकना और रुखा आपस मैं मिल जाते हैं| जैसे जीव में चिकनापन्न है राग और पुद्गल में रूखापन है उसके अणु जो अलग अलग होते है| पुद्गल में घी तेल जैसा चिकनापन्न होता है तो जीव में रूखापन है द्वेष| इन्ही दो गुणों के कारन यह दोनों द्रव्य मिलते रहते है, यह एक नैसर्गिग क्रिया है| माँ श्री जी ने दूध और पानी का उदहारण देते हुए समझाया, दूध मैं चिकनापन होता है और पानी मैं रूखापन, जिसके कारण वो आपस मैं मिल जाते है लेकिन उसके बाद भी दोनों का अस्तित्व अलग-अलग होता है, अलग-अलग लक्षण होते है| पानी ट्रांसपेरेंट होता है और दूध में सफेदी होती है, इन लक्षणों से वो मिल जाते हैं, लेकिन इससे यह भी जान लेते हैं कि दूध में कितना पानी मिला है| यह सारा संसार जो है, इन दो द्रव्यों से ही बना है| अनादि काल से यह मिले हुए हैं लेकिन फिर भी अपने स्वभाव से सब अलग-अलग है, सब में भेद है, कितना भी मिल जाए, लक्षण भेद से इनको भिन्न जाना जाता है|
जीव और अजीव का मिलना भी स्निग्ध और रुख्श की मात्रा पर निर्भर करता है, एक उचित मात्रा मैं ही ये दोनों आपस मैं मिल सकते है| जिसके ज्यादा अंश होते हैं वह वैसा बन जाता है, रूखापन अगर ज्यादा होता है और चिकनापन कम तो वह रुख्श स्वाभाव का हो जाता है और अगर चिकनापन ज्यादा होता है तो वह स्निग्ध स्वाभाव का बन जाता है| स्निग्ध और रुख्श परमाणु स्वाभाविक परिणमन करते रहते है, क्योंकि सब द्रव्य (जीव और पुद्गल) निरंतर परिवर्तन कर रहे है और स्थान से स्तानांतरण कर रहे है इसलिए यही एक दूसरे के साथ मिलते है| यह सारा का सारा संसार ऐसे ही ऑटोमेटिक चलता रहता है| इसको कोई बनाने वाला नहीं है, अपने आप मिल जाते हैं, अपने आप बिछुड़ जाते हैं| राग और द्वेष, इन दोनों से ही बंध होता है, राग की अपेक्षा द्वेष से थोड़ा ज्यादा बंध होता है| परमाणु एक अनु है और यह दोनों गुण (राग और द्वेष) परमाणुऔ मैं होते है| ऐसा नहीं है कि परमाणु कहीं से आते हैं, यह तो सभी जगह होते हैं, चाहे मोक्ष हो, चाहे स्वर्ग हो, चाहे मनुष्य लोक हो, और चाहे नरक लोक हो, सब जगह खचाखच भरे हुए होते हैं| जो मनुष्य राग से वंचित हो जाता है वह मोक्ष को प्राप्त हो जाता है और जो जीव द्वेष से लिपटा है वह बंधन में फंसा रहता है| मोक्ष में भी जीव रहते हैं लेकिन उनमें स्निग्धता और रुख्ता नहीं होती और इसी कारण वह बंधन को प्राप्त नहीं होते| स्निग्धता और रुख्ता का आभाव ही मोक्ष है| किसी स्थान विशेष का नाम मोक्ष नहीं है, भाव विशेष का नाम मोक्ष है|
आगे सरल तरीके से समझाते हुए माँ श्री जी बताती है की, जीव के परमाणु एक-एक अलग-अलग नहीं होते, जीव के परमाणु एक साथ सटे हुए रहते हैं, वह असंख्यात होते है, वह असंख्यात प्रदेश को घेरे होते है और पुद्गल मैं १ भी, २ भी, ४ परमाणु भी होते है| पुद्गल का १ परमाणु आकाश के क्षेत्र जितना होता है जिसको १ प्रदेश भी कहते है| जीव का एक परमाणु असंख्यात प्रदेश को घेर सकता है और ये जीव का परमाणु सिकुड़ता भी है और फ़ैल भी सकता है| जिस प्रकार से एक दीपक की रौशनी एक छोटे कमरे मैं भी समां जाती है और एक बड़े कमरे मैं भी फ़ैल जाती है| इसीलिए जीव के परमाणुओ मैं संकोच और विस्तार की परवर्ती होती है, इसीलिए ऐसा नहीं होता की आत्मा छोटे शरीर मैं छोटी हो गई और बड़े मैं बड़ी, हाथी और चींटी दोनों के ही शरीर मैं आत्मा तो एक सामान होती है और इसीलिए ज्ञान भी दोनों मैं एक सामान हो सकता है और स्निग्धता और रुख्ता दोनों मैं कम ज्यादा हो सकती है लेकिन हाथी के शरीर मैं आत्मा के परमाणु फैले हुए होते है और चींटी के शरीर मैं सिकुड़े हुए होते है| ज्ञानावरणीय कर्म के प्रभाव से दोनों मैं ही ज्ञानता और अज्ञानता हो सकती है| जैसी की १ बाल्टी पानी और १ गिलास पानी, दोनों मैं ही उबलने की क्षमता है, जितनी जिसमे उषणता प्रवेश करेगी वो उतना गरम होगा, तो गर्मी का सम्बन्ध परदेशो की संख्या पर निर्भर नहीं करता वो उसके गुण के विकास अविकास पर निर्भर करता है| गिलास का पानी इतना गरम हो सकता है की हाथ जला दे और इतना गरम भी हो सकता है की उसमे नाहा लो, सिकाई कर लो| जैन दर्शन मैं इतना विस्तार है की उसका कोई अंत नहीं|
आगे समझाते हुए माँ श्री बताती है की - प्रत्येक द्रव्ये की चार बाते होती है -
१. प्रकर्ति - क्या स्वाभाव है इनका
२. स्तिथि - कितने समय के लिए है
३. अणुभाव् - गुणों की शक्ति कितनी है
४. प्रदेश - कितनी संख्या मैं है
एक कर्म जो अभी बंधा है वो तत्काल फल नहीं देता| कर्म को उदय मैं आने के लिए समय लगता है जिसको अबाधा कहते है, जैसे की अगर आम का बीज अभी बोया तो उसको फल देना मैं अगर १० साल लगे तो उसकी १० साल की अबाधा है| यह १० साल या ५ साल भी उस आम के बीज की गुणवत्ता पर निर्भर है| ऐसे ही कर्म कितनी तीव्रता, कितने कठोर विचारो से किया है, उसकी अबाधा भी उसपर निर्भर है| ज्यादा तीर्व विचारो से किया गया अच्छा या बुरा कर्म, ज्यादा अबाधा मैं आएगा और उसका ज्यादा अणुभाव् भी होगा| जैसे तीव्रता से छोड़ा गया बांड, ज्यादा दूर तक जायेगा और ज्यादा तेजी से भेदेगा| जब कर्म का फल देने का समय आता है तो यह चार बाते उनमे विशेष होती है, जैसे की, उसकी प्रकर्ति - अच्छे कर्म का उदय है या बुरे कर्म का, स्तिथि - कितने समय के लिए आया है, अणुभाव् - कितनी शक्ति है इस कर्म मैं, और, प्रदेश - कितनी संख्या मैं एक साथ उदय हुए है| माँ श्री ने महाभारत की एक विशेष घटना का उदहारण देते हुए समझाया - जब महाभारत की लड़ाई समाप्त हो गई तो कृष्ण जी ने पांडवो से कहा की पिताम्हा इतने ज्ञानी, विद्वानी है, चलो इनसे कुछ शिक्षा लेने चलते है| उनके पास जब पहुंचे तो पिताम्हा ने ही कृष्ण जी से प्रश्न कर लिया की हमने जीवन मैं कोई भी ऐसा काम नहीं किया की हमे सरसैया पर लेटना पड़े, तो कोनसे पाप का फल है? कृष्ण जी ने उनके सर पर हाथ फेरा और कहा की अपने जीवन जो देखो पहले, पिताम्हा जी को अपने जीवन के सभी पुराने भव दिखने लगे, उन्होंने १ भव देखा, दूसरा भव देखा, तीसरा भव देखा और देखते गए-देखते गए और आगे देखने पर सोवे भव के पश्चात् वो बोले ओह ये भव है, जिसमे वो छपरा गाड़ी मैं जा रहे थे और उनके रस्ते मैं एक सर्प आ गया, उन्होंने जल्दी जाने की अपेक्षा से धनुष के एक बांड से उस नाग बींध दिआ और उसको कांटो वाली झाड़ी मैं फेंक दिआ और वो नाग कांटो मैं फंसकर तड़प-तड़प के मारा, सारा शरीर उसका कांटो से बींद गया| तब उन्हें समझ आया की ये पाप किआ था जिसका फल मैं इस भव मैं झेल रहा हूँ| कब का कर्म कब उदय मैं आता है वो, उसकी तीव्र कषाय से किआ हुआ हो, तो उतनी देर से आएगा, ज्यादा शक्ति लेकर आएगा| हम जीवन को इतने से मैं देखते है, जबकि जीवन तो बहुत भवो से बना है|
आज माँ श्री ने कर्म-सिद्धांत का विस्तार से उन्मोचन किया; आगे इस विषय पर और दिशा-दर्शन देंगी।
माँ श्री कौशल जी की जय |
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